Friday, December 31, 2010

ईसवी सन २०११ की हार्दिक शुभ कामनाएं !!!

Sunday, December 26, 2010

Swami Vivekananda's life through pictures

Swami Vivekananda Chicago Speech - Why we disagree

Swami Vivekananda Speech at Chicago - Welcome Address

Swami Vivekananda's Address to the World Parliament of Religions September 1893

Sisters and Brothers of America,
It fills my heart with joy unspeakable to rise in response to the warm and cordial welcome which you have given us. I thank you in the name of the most ancient order of monks in the world; I thank you in the name of the mother of religions, and I thank you in the name of millions and millions of Hindu people of all classes and sects.
My thanks, also, to some of the speakers on this platform who, referring to the delegates from the Orient, have told you that these men from far-off nations may well claim the honor of bearing to different lands the idea of toleration. I am proud to belong to a religion which has taught the world both tolerance and universal acceptance. We believe not only in universal toleration, but we accept all religions as true. I am proud to belong to a nation which has sheltered the persecuted and the refugees of all religions and all nations of the earth. I am proud to tell you that we have gathered in our bosom the purest remnant of the Israelites, who came to Southern India and took refuge with us in the very year in which their holy temple was shattered to pieces by Roman tyranny. I am proud to belong to the religion which has sheltered and is still fostering the remnant of the grand Zoroastrian nation. I will quote to you, brethren, a few lines from a hymn which I remember to have repeated from my earliest boyhood, which is every day repeated by millions of human beings: "As the different streams having their sources in different paths which men take through different tendencies, various though they appear, crooked or straight, all lead to Thee."
The present convention, which is one of the most august assemblies ever held, is in itself a vindication, a declaration to the world of the wonderful doctrine preached in the Gita: "Whosoever comes to Me, through whatsoever form, I reach him; all men are struggling through paths which in the end lead to me." Sectarianism, bigotry, and its horrible descendant, fanaticism, have long possessed this beautiful earth. They have filled the earth with violence, drenched it often and often with human blood, destroyed civilization and sent whole nations to despair. Had it not been for these horrible demons, human society would be far more advanced than it is now. But their time is come; and I fervently hope that the bell that tolled this morning in honor of this convention may be the death-knell of all fanaticism, of all persecutions with the sword or with the pen, and of all uncharitable feelings between persons wending their way to the same goal.

Sunday, December 19, 2010

भगवा आतंकवाद !!

राहुल गाँधी और कांग्रेस  ने इस शब्द को दुनिया के शब्द कोष में बखूबी जोड़ दिया है और इस धर्मनिरपेक्ष और अति देश प्रेमी (?) आचरण के लिए बधाई के पात्र है.
शायद हम दुनिया के अकेले धर्मानुयायी है जिनका धर्म ऐसे अपशब्दों  का भी स्वागत करता है. आखिर इस शब्द के पीछे मकसद क्या है?? क्या वाकई भारत के सामने एसी कोई  समस्या है?? क्या सचमुच कोई हिन्दू आतंकवादी है?? शायद राहुल के पास इस बात के पुख्ता प्रमाण हो?? जिन कुछ घटनाओं के परिप्रक्ष में इस शब्द का जन्म हुआ है क्या अभी तक (कांग्रेस की सर्कार रहते) कोई हिन्दू दोषी पाया गया है ??? और क्या अपराधी आतंकवादी का कोई धर्म  होता है???इसका जबाब न तो कांग्रेस के पास है न ही राहुल के पास???

इसमें दोष राहुल का नही है जो आदमी अपनी शिक्षा बहार विदेश से लेकर आया हो और भारत में शायद ही कभी रहा हो वह हिन्दू धर्म और भारत की आत्मा को कैसे समझ सकता है??? 
जर्मनी में अपने प्रवास के दौरान स्वामी विवेकानंद जी ने किसी सेमिनार में कहा था "भारतीय लोग राजनीतिक रूप से उतने जागरूक नही है जितने धार्मिक रूपसे" शायद राहुल को यह बात मालूम नही है. जिस बात का कांग्रेस फायदा लेने की शोंच रही है कहीं वही बात उसका सफाया न करदे ???

शर्मनाक है की एसी वोछी बातें धर्मनिष्ठ "बापू" के तथाकथित अनुयायी और वारिस बोल रहे है.

Monday, November 29, 2010

टेक्नोलोजी

टेक्नोलोजी ने हमें कितना बदल दिया है ??? एक दिन discovary  चैनेल पर भोजन पर आधारित एक कार्यक्रम देख रहा था तो सूत्रधार की एक लाइन मन में बस गयी "हम खाने को जितना बदलते जायेंगे खाना भी हमें उतना ही बदलता जायेगा" सचमुच कितना सच है. हम जीवन में जितने आराम तलब और प्रोसेस फ़ूड खाने वाले होते जा रहे है हमारी शरीरिक संरचना भी उतनी ही बदलती जा रही है.

मै सोंचता हूँ की यही बात टेक्नोलोजी के सन्दर्भ में भी कही जा सकती है.  टेक्नोलोजी के अनंत आविष्कारों ने हमारी जीवन की दशा और दिशा दोनों बदल कर रख दी है. एक उदहारण अगर हम फ़ोन का लेलें तो इसके अविष्कार और विकास के साथ पत्रों और डाकिया का कम समाप्य प्राय हो गया है . उंगुलियो की स्पीड पर लोगों से जुड़ जाना और बात करलेना कितना सरल और परिचित हो गया है. पर अगर हम सोंचे तो क्या वाकई में मोबाइल फ़ोन चिठियों का स्थान पर उनके भावात्मक विकल्प बन पाए  है....??????

इस बात का दर्द और मतलब शायद नयी पीड़ी न समझे, पर वे लोग जरूर जानते है जिन्होंने अपनों से दूर रह कर उनको चिठ्ठी लिखी है. या फिर इस बात का महत्व उस औरत से पूंछो जिसने हर अपने प्रीतम के ख़त के इंतजार में सुबह से शाम तक डाकिये का रास्ता देखा हो..... जहाँ तक मेरा मानना है फोन कितने भी सुगम और सरल क्यों न हो जाएँ ये कभी भी चिठ्ठियों की जगह नही ले सकते. इनमे वो भाव सम्प्रेषण शक्ति, वैसी बिह्बलता और आतुरता न अ पायेगी. चिठ्ठियों में जो अपनापन था जो लगाओ था ओ इनमे कहाँ....

एक दूसरा उदहारण टी. वी. का लें. इस छोटे से बक्से ने हमारी पुरी दुनिया को समेट कर एक कमरे में बंद कर दिया है. शायद हम समझ भी नहि पाए हैं की कब इसने हमें इतना एकाकी, अपने में व्यस्त रहने वाला बना दिया है. हमारे समय का सबसे ज्यादा दुरपयोग करने वाले इस अविष्कार ने हमें अपनों में भी बेगाने जैसा अहसास दिया है . एक दृश्य लें , घर में सब अपना फेवोरित डेली सोप देख रहे है और इतने में कोई मेहमान अ जाये ??? हम उसके खातिरदारी तो जरूर करेंगे (बचे हुए संस्कार) पर बहुत ही अनमने भाव से ये सोंचते हुए की पता नही कहाँ से अ टपके, अच्चा खासा सीरिअल छूट गया.
यही नहीं टी. वी. ने बछो को इतना बदतमीज बना दिया है की वे रिमोट के लिए बड़ों से भीड़ जाते है. पापा को शयद डरते भी हों बेचारे दादी और बाबा की तो आफत ही समझो....

इन अविष्कारों ने हमारी जिन्दगी को बदल दिया है...इनके अनेको लाभ की वजह से आज जीवन कहीं जादा सुबिधा परक एवं आसन हो गया है.......

पर जरूरत इस बात की है की इन मशीनों का प्रयोग करते करते कही हमारा भी तो मशीनीकरण नहीं होता जा रहा है?????

Saturday, November 13, 2010

ओ मन बावरे !!

कई बार ये बात मेरे मन में आती है,
                                              और शायद आपके भी ??
की जीवन सचमुच क्या है?
                                   और क्यों?
बहुतेरों ने इस प्रश्न का उत्तर देना चाहा
                                    पर सचमुच क्या किसी को है खबर?
कई बार तो मै कहता हूँ
                               की मन बावरे ये इतनी दुविधा क्यों?
क्यों इतनी चिंता, इर्ष्या, द्वेष.
                                        इतनी दुर्भावना क्यों ?
शंसय बहुत प्रबल शत्रु है..
                               और शायद मित्र भी ?
जीवन की इतनी अनिश्चितता ?
                                  और ये मिथ्या आडम्बर ??
ओ मन बावरे !! जरा ठहर !
                                  साँस ले इस उठापठक और आप धापी से.
दो पल बैठ और सोंच...
                                प्यार से जीने पर जीवन सरल है ?
या नही ??
                               
                                         

Thursday, November 4, 2010

दीपावली की हार्दिक बधाई !!!

  आप सब को दीपावली की हार्दिक बधाई ! यह प्रकाश पर्व आप के मन को रोशन करे और वहां से अंधेरों को दूर करे !! 

Sunday, October 31, 2010

आदर्श सोसाइटी ??

आदर्श सोसाइटी के नाम पर जो अनादर्श गढ़े गए हैं उस पर आम जनता एक बार और कराही है. एसा इसलिए क्योंकि हम भारत के लोग सदियों की गुलामी के बाद अपने स्वाभिमान और उज्जवल चरित्र के लहूलुहान शरीर  लेकर चल रहे है. जब भी कोई उसपर  एक वार करता है या फिर भ्रष्ट चारी पिशाचों के नाखून चुभते है तो एक हलकी कराह निकलती है और फिर ख़ामोशी छा जाती है.
                                                         अपना बलिदान देकर देश की आन बान और शान रखने वाले महावीरों के नाम पर बनी आदर्श सोसाइटी में राजनेताओं तथा नौकरशाहों ने जो बन्दर बाँट की है क्या यह देश का एसा पहला मामला है ?
न तो यह पहला एसा मामला है और न ही श्री अशोक चौहान एसे पहले व्यक्ति है.
                                                             हमारा पूरा तंत्र ही इस पैशाचिक दलदल में फंस चुका है. आज हर आदमी तभी तक उज्जवल चरित्र और आदर्श बनता है जब तक की उसके पास बेईमानी का मौका न हो. अपना नंबर आते ही हर कोई रूप बदल लेता है. भ्रस्टाचार और खुले आम रिश्वतखोरी हमारे देश का बहुत ही कडवा सच है.
                                                             एसे नरपिशाच न तो गरीबों का दुःख देखते है, और न महावीरो के  पवित्र लहू का सम्मान करना जानते है. अब तो एसा लगता है की गाँधी जी  और लालबहादुर शास्त्री जी जैसे परीकथाओं में रहे हो.
आज उस राजनेता का उदाहरन ढूंढने से भी न मिले. हाय रे वह ऊचच कोटि का उज्जवल आदर्श ! बाप प्रधानमंत्री है तो भी बेटा दिल्ली की सरकारी बसों में आम आदमी की तरह पढने जाता है. यह भी भारत में ही हो सकता है.
                                                             हमारी असमानताएं कुछ ज्यादा ही बड़ी है. जानें इन लोगो पर लगाम कसे और कब लगे. इन स्वदेशीये नराधमो से भारत माता कैसे बचे ??  दुःख ....दुःख .....दुःख....गहरा दुःख...
                                                                  

Saturday, October 30, 2010

मुझको लौटा दो बचपन का सावन !!!

बचपन भी क्या खूब है !

                             शायद इश्वर का भी यही स्वरुप है ?                             
छोटा पर विशाल हिर्दय,
                                    सब पर स्नेह उड़ेलने को व्याकुल .
न दोस्ती की परवाह
                                     न दुश्मनी की समझ
बचपन भी क्या खूब है!!

न जीवन के झंझावातों का भय
                                           उन्मुक्त मन, निर्विकार, निर्भय.
उनकी एक मुस्कान,
                                 छू कर देती है चिंता, थकान.
न कोई तोल न मोल,
                              क्या अनुरूप, क्या प्रतिरूप है.
शायद ईश्वर का यही स्वरुप है ??


Friday, October 29, 2010

किस ओर को जाते हैं ????

भारत की इकोनोमी ९ % की रफ़्तार से भाग रही है . हम दुनिया में सबसे जवान देश है. हमारी सभ्यता हमारी विरासत सबसे पुराणी है . हम विस्वा गुरु होने का ख्वाब दुबारा सच करना चाहते है . हमारा धर्म हमारे संस्कार हमें मनुष्य में विभेद नहि सिखाते.
                             किन्तु हाय ! गहरी निराशा,  गहन छोभ !  आज भी ३० % लोग मूलभूत अवस्यक्ताओं से नितांत वंचित है. कुपोषण और अशिछा जैसी बेहद शर्मनाक समस्याए आज भी हमारी चिंता का सबसे बड़ा मुद्दा है? मुझे कुछ दिनों महाराष्ट्र और गुजरात  (बताता चलूँ की यह भारत के अग्रणी राज्यों में से एक है) में भ्रमण का समय मिला है. इसी तरह मै हरयाणा के भी कुछ ग्रामीण इलाकों में भ्रमण कर चूका हूँ. पर इन globlization के सबसे बड़े भारतीय माडलों में स्थिति कोई खास उत्साह जनक नहि है. इन प्रदेशो में उपरोक्त समस्यायों के साथ साथ सांस्कृतिक छरण की नयी समस्या भी उत्पन्न हो गयी है. यह समस्या अचानक जमीन बेंचकर अमीर हुए लोगो में जादा है. अपराध और नशे की प्रवृत्तियां इन प्रदेशो में सबसे जादा बढ़ी है. महाराष्ट्र सबसे बड़ा शराबियो का अड्डा बन चूका है (शराब खपत में नंबर . एक)  आज भी सड़क किनारे नर्किये जीवन को मजबूर लोगो दर्शन होना आम बात है. एक तरफ विकास की चकाचौंध और उपभोक्ताबाद से दमकते हमारे शहर और उनके कुछ खास लोग है तो दूसरी तरफ गाँधी जी के ये तीसरे लोग जो अभी भी दुसरे नही हुए है.
                                   आज जब राष्ट्र मंडल खेलों में हजारों करोण की घपले बाजी होती है या सांसदों की वेतन वृद्धि २०० % तक की जाती है तो मन चक्कर खता है. दिमाग साथ नहि देता. समझ में बिलकुल नही आता की इस असमानता और विडम्बना का कोई अंत होगा या नहि??

पर दिल कहता है की ये भारत है यह कुछ भी हो सकता है. इसलिए सोचता हूँ उम्मीद कायम रखना ही अच्छा है.

Saturday, October 23, 2010

बिहार

बिहार में हर तरफ विकासवादी राजनीत का ही जलवा है . लालू प्रसाद यादव भी अब जातिवाद को तिलांजलि देकर विकासवाद को अपनी नव का सहारा बना रहो है. ये चुनाव वाकई में बिहार की दिशा निर्धारित करेंगे . बिहार को अपराध, बाहुबली, जाती, और भ्रस्ताचार का दलदल या विकास की साफ अबो हवा में से किसी यक को चुनना होगा.
ibahar ko caunaava [sa baar rajanaIitk paiT-yaaoM ka hI BaivaSya ina-Qaairt nahIM krnao vaalao hOM balik [sa caunaava pirNaama sao ibahar kI dSaa AaOr idSaa ka BaI fOsalaa haonao vaalaa hO. jaao BaI hao ikntu  ibahar kI rajanaIit koa svaC krnao ka jaao sarahnaIya kaya- inatISa jaI nao ikyaa hO ]sako ilayao vao p`SaMSaa ko pat` hOM. khIM naa khIM ibahar mao ivakasavaadI rajanaIit ka saohra  ]nako hI isar pr hO.

Interest and commitment !!!



Sunday, August 15, 2010

आज़ादी मुबारक हो !!

आप सब को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई !!!

Sunday, July 18, 2010

उद्यमेन ही सिध्यन्ति



"उद्यमेन ही सिध्यन्ति कार्याणि नहि मनोरथे, नहि सुप्तस्य सिंघस्य प्रविशन्ति मुखे मृगः "

Tuesday, July 13, 2010


"लोग उगते सूरज को सलाम करते है । अगर आप जीत रहे है , सफल है तो आपसे कोई सवाल नहीं करेगा । आप जो भी करेंगे मार्गदर्शन की तरह होगा। पर वाही कार्य अगर एक असफल आदमी करेगा तो उसकी उम्र केवल सफाई देने में बीत जाएगी।"

Wednesday, July 7, 2010


"हर दिन की रौशनी सभी सात रंगों को अपने में समेटे रहती है। न कभी एक कम न कभी एक ज्यादा। जरूरत बस प्रिज्म को सही दिशा में सैट करने की है। अच्छाई-बुराई , लाभ - हानि, सुख-दुःख, गुण-अवगुण सब इस दुनिया में उपलब्ध है , निर्भर करता है की आपकी रूचि किसमे है। आपका सन्दर्भ क्या है और आपकी स्वाभाविक वृत्ति क्या ही आपका जीवन के प्रति नजरिया क्या है । "

Tuesday, July 6, 2010

क्षमा


"छमा मांगना कभी आपके गलत होने या छोटेपन का परिचायक नहीं है । इसका बस साधारण सा मतलब है की आप अपने घमंड और बडबोलेपन से ज्यादा अपनी सौम्यता, विनम्रता, और सहज प्रेम को तरजीह देते है। इसका मतलब है की आप अपने रिश्ते को अपने लाभ हनी से ज्यादा महत्वा देते है।"

Tuesday, May 25, 2010

भूल मनुष्य का स्वाभाव है


"गलतियाँ करो, रिस्क उठाओ और हर दिन नयी चीज सीखो यही जीवन है"

Monday, February 22, 2010

धन्यवाद गूगल !!!!!!

गूगल इंक का आभार !! उनके इस बेहतरीन कार्य हेतु जिसकी वजह से आज हम भारतीय लोग अपनी मात्र भाषा में इतनी सुबिधा पूर्वक कार्य कर रहे है और विचारो के बेरोकटोक आदान प्रदान हो रहे है। आज जब अंग्रेजी राज है, (अंग्रेजी भाषा) सामान्य जन भी हिंदी के नाम पर झेप महसूस करते है और अंग्रेजी न जानने पर शर्मिंदा और छुब्ध महसूस करते है, ऐसे समय में जब अंग्रेजी ही कंप्यूटर के लिए अनिवार्य सी हो, गूगल का यह कार्य न सिर्फ प्रसंस्निये है अपितु हम हिंदी वालो पर एक ऋण की तरह है। गूगल टीम आपके इस अति सराहनीय कार्य के लिए कोटि कोटि साधुबाद !!!!!

"भारत माता के विभिन्न स्वरुप"
















"स्वतंत्रता संग्राम "

Sunday, February 21, 2010

फिर पाकिस्तान से बातचीत ????

सुन रहा हूँ भारत और पाकिस्तान फिर वातचीत करेंगे। मुंबई तुम्हारे घाव भरे की नहीं ???????? मुंबई ताज हमले के दोषियों को पकड़ने और दण्डित करने पर सरे आम सहयोग न करने और ठेंगा दिखने वालों को फिर बिसलरी और लखनवी बिरयानी खिलने की तयारी हो रही है। मेनन साहब शांतिदूत का रोल हथियाने की आपा धापी में हैं। खद्दर धारियों को आखिर कब अक्कल आयेगी। कुछ स्वाभिमान है तुम लोगोमे या सब धो डाला ????
३ बड़े युद्ध, और न जाने कितने छद्म युद्ध, लाखो शहीद, पर हमारे नेता लोग वार्ता करने से न थके । लाल बहादुर जी ने बात की थी, नतीजा ???? इंदिरा जी ने बात की थी, नतीजा ????? अटल जी ने बात की थी, नतीजा ??????? शायद हम पाकिस्तान की नस्ल पाचन नहीं प् रहे है या फिर अपने शहीदों के खून की गरिमा और सम्मान को भुला चुके है। पिछले एक साल से सरे सम्बन्ध समाप्त है तो कोई वारदात नहीं हो रही है । बातचीत का जिक्र छिड़ा तो पुणे बम ब्लास्ट हो गया। मेनन साहब अपने पूर्व विदेशमंत्री श्री कृष्ण मेनन को भूल गए क्या ????? चीन हमले की तयारी कर रहा था और वे हिंदी चीनी भाई भाई के स्लोगन लिख रहे थे। मेरे दोस्त जितना लूटना खसोटना है लूटो, हम गरीबो के खून पसीने की कमाई पर गुलछर्रे उडाओ लेकिन अपने महत्वाकंछओं के लिए मेरे मातृभूमि के साथ खिलवाड़ मत करो। नहीं चाहिए पाकिस्तान की दोस्ती हमारे लिए सील बोर्डर ही अच्छा है।

आशा और निराशा



आशा ही जीवन है, और हताशा मृत्यु । हे सर्वशक्तिमान परमात्मा के अंशो अपने को पहचानो और निराशा के भंवर से बहार आओ । तुम्हारी सीमा सिर्फ तुम्ही निर्धारित कर सकते हो ।

"उत्तिष्ठति जाग्रत प्राप्यं बरान्निबोध्त "

Saturday, February 20, 2010

शारुख का पाकिस्तान प्रेम !!!

शारुख खान के बयां पर शिव सेना का विलाप उचित है या नहीं, इस पर मई कोई नयी बहेस करना नहीं चाहता । किन्तु मिस्टर खान की पाकिस्तानी खिलाडियों के प्रति हमदर्दी भरा लहजा मुझे समझ में नहीं आया। सब जानते है की पाकिस्तान के साथ हमारे समबन्ध इस समय जो भी है वो क्यों है ??? और किसकी वजह से है ???? क्या पाकिस्तानी क्रिकेटर पाकिस्तानी शोच से परे है ??? क्या उनमे से किसी ने, और मै यहाँ तक कहना चाहूँगा की किसी रुतबा रखने वाले पाकिस्तानी ने कभी भारतीयओं के प्रति वही हमदर्दी और दोस्ती का बयां दिया है ??? यह पहला मोका नहीं है जब खान महोदय देश के ऊपर धार्मिक बंधुता को तरजीह दे रहे हैं। अगर आप को याद हो तो २० - २० विश्व कप हरने के बाद पाकिस्तानी कप्तान ने दुनिया भर के मुसलमानों से छमा मांगी थी, और दुसरे दिन एक बयान में मिस्टर खान उसके सफाई में बयां देते नजर आये थे । लन्दन में एक सार्वजानिक सभा के दौरान मिस्टर खान के उद्गार थे की हम भारतीय और पाकिस्तानी एक जैसे हैं और सामान सांस्कृतिक मूल्यों का साझा करते है । उसी समय बड़े विश्वास और गर्व से उन्होंने बताया की पाकिस्तान हमारा अच्छा पडोसी है ???? मेरा एक ही अनुरोध है की शिव सेना को वो अपने विचार से सहमत कर पाए या नहीं, शारुख साहब सिर्फ एक उस परिवार को अपनी बात से सहमत करके दिखा दीजिए जिसने २६ / ११, संसद भवन हमले, कारगिल, न जाने कितने बम बिस्फोतो में अपने प्रिये जानो को खोया हो। आप ये बात उन कश्मीरी पंडितो को समझाईये जो अपने देश में ही सरनार्थी का जीवन जी रहे हैं। पाकिस्तान अच्छा पडोसी है ये बात आप कारगिल की विधवा बहनों को समझाईये जिनकी मांग इस नापाक मुल्क की नापाक हरकतों से सूनी हो गयी। क्या इतने सरे घावों के परे है क्रिकेट प्रेम ??? क्या वाकई क्रिकेट राष्ट्र प्रेम से बड़ा मुद्दा है ??? हम दुश्मनों को दोस्ती सिखाते है, नफ़रत में प्यार भरते है क्योकि यही हमारी १०,००० वर्षों की सभ्यता का मूल है। लेकिन पाकिस्तान की ६५ वर्षीय सभ्यता ने उसे पीठ में छुरा घोपना ही शिखाया है, वो दोस्ती प्यार जैसे जुमलों को सिर्फ जुमला ही मानते है। हममें और उनमे कोई समानता नहीं है। शारुख जी कृपया अपनी समझदारी अपने पास ही रखिये। इतने घाव काफी है उनकी नस्ल समझने के लिए..............

"ऊंचाई और हम"


हम जितना ऊँचा उठते जाते हैं निचे वालों को हम उतना छोटे दीखते हैं।