Saturday, December 31, 2011

self-confidence !!

The business executive was deep in debt and could see no way out. Creditors were closing in on him. Suppliers were demanding payment. He sat on the park bench, head in hands, wondering if anything could save his company from bankruptcy.     Suddenly an old man appeared before him. "I can see that something is troubling you," he said. After listening to the executive's woes, the old man said, "I believe I can help you."     He asked the man his name, wrote out a check, and pushed it into his hand saying, "Take this money. Meet me here exactly one year from today, and you can pay me back at that time." The business executive saw in his hand a check for $500,000, signed by John D. Rockefeller, then one of the richest men in the world!     "I can erase my money worries in an instant!" he realized. But instead, the executive decided to put the un-cashed check in his safe. Just knowing it was there might give him the strength to work out a way to save his business, he thought.     With renewed optimism, he negotiated better deals and extended terms of payment. He closed several big sales. Within a few months, he was out of debt and making money once again.     One year later, he returned to the park with the un-cashed check. At the agreed-upon time, the old man appeared. But just as the executive was about to hand back the check and share his success story, a nurse came running up and grabbed the old man.     "I'm so glad I caught him!" she cried. "I hope he hasn't been bothering you. He's always escaping from the home and telling people he's John D. Rockefeller."And she led the old man away.     The astonished executive just stood there, stunned. All year long he'd been wheeling and dealing, buying and selling, convinced he had half a million dollars behind him.     Suddenly, he realized that it wasn't the money that had turned his life around. It was his newfound self-confidence that gave him the power to achieve anything he went after.

Monday, December 19, 2011

आदम गोंडवी को नमन !!!


हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये

अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िये



हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है

दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िये

...

ग़र ग़लतियाँ बाबर की थीं; जुम्मन का घर फिर क्यों जले

ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िये



हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ

मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये



छेड़िये इक जंग, मिल-जुल कर गरीबी के ख़िलाफ़

दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेड़िये

Sunday, December 4, 2011

 सदा बहार, अत्तयंत सकारात्मक सोंच वाले, तथा सिनेमाई जगत में अपनी एक अलग शैली के लिए मशहूर अभिनेता देव आनंद साहब नहीं रहे. उनकी फिल्मे जहाँ एक ओरे उनके बेमिशाल अभिनय  के लिए जानी जाती है वही दूसरी और मनमोहक गीत के लिए भी. भगवन उनको शांति दे और परिवार वालों को इस शोक्दायी पल से उबरने की शक्ती दे.

Wednesday, November 16, 2011

हिटलर के अनुभव भारतीय सन्दर्भों में !!

हिटलर की जीवनी "मेरा संघर्ष" पढ़ी उसके बहुत सारे अनुभव भारतीय सन्दर्भों एकदम फिट बैठते है. संसदिये लोकतंत्र के बारे में उसकी एक टिप्पणी देखें "संसदिये प्रणाली में ऊपर बैठा नेता यह जनता है दुबारा पदासीन होने का मौका मिले न मिले अतः वह कुर्सी से चिपकने के सरे तिकड़म आजमाता है, वहीं दूसरी तरफ नीचे के नेता गन उसको महा धूर्त, तिकडमी, पद लोभी आदि कहते है और किसे भी तरह उसको पद्चुत करने और अपना मार्ग प्रशस्त करने में लगे रहते है. एसे में जनहित, देशहित आदि सिर्फ शब्दालंकार बन कर रह जाते है. सही मायने में कोई जनप्रतिनिधि न होकर अपना ही हित साधने में लगे रहते है....."


                                भारतीय सन्दर्भ में कितना सच है उसका अनुभव. संसदिये लोकतंत्र के औचित्य पर एक बहस हो सकती है. और हिटलर का उपरोक्त अनुभावोप्रांत किया गया कार्य अनुचित हो सकता है. तो भी क्या हम उपरोक्त बैटन की सत्यता से इंकार कर सकते है......मीडिया से सम्बंधित एसी ही उसकी एक मजे दार टिप्पणी देखे..."प्रेस में सब दलाल भरे होते है....वे नीच व्यक्तियों को महिमा मंडित करते है और किसी भी अंजन व्यक्ति को रातों रात प्रसिधी दे देते है.....वहीं दूसरी ओर ईमानदार व्यक्तियों की एसी उपेक्षा की जायेगी या फिर मिथ्या दोषारोपण किया जायेगा की वह राजनीत से ही सन्यास लेने को मजबूर होजाये. एसे में हम राजनीत में ईमानदार और देशभक्त लोगों के आपेक्षा कैसे करसकते है......."  

Saturday, November 12, 2011

मैं नीर भरी दुख की बदली!

मैं नीर भरी दुख की बदली!




स्पन्दन में चिर निस्पन्द बसा

क्रन्दन में आहत विश्व हँसा

नयनों में दीपक से जलते,

पलकों में निर्झारिणी मचली!



मेरा पग-पग संगीत भरा

श्वासों से स्वप्न-पराग झरा

नभ के नव रंग बुनते दुकूल

छाया में मलय-बयार पली।



मैं क्षितिज-भृकुटि पर घिर धूमिल

चिन्ता का भार बनी अविरल

रज-कण पर जल-कण हो बरसी,

नव जीवन-अंकुर बन निकली!



पथ को न मलिन करता आना

पथ-चिह्न न दे जाता जाना;

सुधि मेरे आगन की जग में

सुख की सिहरन हो अन्त खिली!



विस्तृत नभ का कोई कोना

मेरा न कभी अपना होना,

परिचय इतना, इतिहास यही-

उमड़ी कल थी, मिट आज चली!

Sunday, October 30, 2011

संघ से भयभीत टीम अन्ना ?

कभी अन्ना कहते है की वे संघ के किसी पदाधिकारी का नाम तक नहीं जानते, और संघ का कोई कार्य करता उनके आन्दोलन में शामिल नहीं था. कभी कश्मीर मुद्दे पर तमाचा खा चुके प्रशांत कहते है की संघ उन्हें समर्थन दे इस्ससे उन्हें परहेज है.....और फिर कहते है की परहेज नहीं है...

प्रश्न यह है की अन्ना का आन्दोलन राष्ट्रीय है या वैक्तिक? क्या संघी विचारधारा के लोग भारतीय नागरिक नहीं है? और यदि अन्ना राष्ट्रीय आन्दोलन चला रहे है तो कौन संघी है कौन बजरंगी है, कौन भाजपाई कौन कांग्रेसी?? कोई भी व्यक्ति पहले भारतीये है, पहले राष्ट्र का है बाद में किसी पार्टी या बिचारधरा का. और इस हिसाब से संघ या किसी अन्य संघटन के कार्य करता का पूरा अधिकार है की वे किसी भी राष्ट्रीय मुद्दे के आन्दोलन में भाग लें और कार्य करें.
यदि अन्ना या उनकी टीम ये समझती है की संघ से अपरिचय दिखा कर वे किसे उजले कुरते वाली जमात में बने रहेंगे तो वे भयानक भूल की तरफ है....और निश्चय ही आत्म प्रवंचन और भटकाव की तरफ बढ़ रहे है.....

राष्ट्रीय आन्दोलन कभी भी जाती सम्प्रदाए या वैक्तिक वैचारिक सीमावो  से बांध कर नहीं चलते...यदि हम जाती और संप्रदाय  या विचार धारा के हिसाब से देखने लगे तो सड़क पर अकेले अन्ना ही बचेंगे.

संघ एक राष्ट्रवादी संघटन है उनकी अपनी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा है....और वे कोई पाकिस्तानी आतंक वादी संघटन नहीं जिसके लोग आराम से जेलों में बिरयानी खा रहे है.......ये अलग बात है की भारत में संघ का चुनावी समर्तः (बी जे पी) के रूप में इस देश में वैसा न हो किन्तु उनकी विचारधारा के बहुतायत बिन्दुवों पर किसी भी राष्ट्रवादी भारतीय को समस्या नहीं हो सकती या होनी चाहिए एसा मेरा मानना है....

मुझे नहीं लगता अन्ना को एसे अनावश्यक मुद्दों पर सफाई या बयानबाजी करनी चाहिए. राष्ट्र सबका सामान रूप से है चाहे वो मुस्लमान हो या हिन्दू....संघी या मार्क्सिस्ट अथवा कांग्रेसी....इस तरह की अनावश्यक बयानबाजियों से अन्ना असल मुद्दों से भटकेंगे और और इस राष्ट्रीय लडाई को गहरी छति  पंहुचेगी......

Thursday, October 13, 2011

पर उपदेश कुशल बहुतेरे........

आज के हालात पर  ओशो का कथन, मालूम नहीं कहाँ पढ़ा था, स्मरण हो रहा है..."इतनी भक्ती, इतनी पूजा, इतने यात्राये, इतने घनघोर प्रवचन, इतने सम्प्रदाए और सन्यासी.......फिर इतनी अशांति, इतना अनाचार, दुराचार, भ्रस्ताचार, व्यभिचार, इतना पाप.......या तो हमरी प्रार्थनाएं सच्ची नहीं है या फिर ईस्वर का अस्तित्त्व ही नहीं है......." कितना सार्थक है...
                                                                      टी. वी. चैनलों. पर लगातार चल रहे प्रवचन, पञ्च सितारा महात्मा जी और पंडाल ....करोनो अनुयायी.....और देश की  दशा और दिशा ???  हर भ्रस्ता चारी कही न कही तथाकथित महात्माओं का हस्त प्राप्त है....

                                                                 कभी कभी तो लगता है जैसे भ्रस्ता चार हमारी विरासत में है. मंदिरों में इतने चढ़ावे....???और हजारों भुखमरी के शेकर....हजारों...कुपोषण के शिकार....अशिक्षा का अंधकार....सब इस महँ देश में एक ही धरती पर एक साथ.   किस काम की  हमारी श्रधा और आध्यात्मिकता...??? सगे भाई और कुटुम्बी दरिद्यता का अभिशाप भुगतने को मजबूर और हम दान पुण्य  और चडावे में मशरूफ ......क्या सच में हम अपने आप को और प्रेम को ईश्वर को जन पाए हैं.....???

Sunday, October 2, 2011



शत शत नमन !! भगवन वर्तमान कंग्रेस्सियों को सदबूधी दें .

Saturday, August 27, 2011

अन्ना हजारे सही या गलत?

आज अन्ना हजारे से विरोध रखने वाले सबसे ज्यादा अगर किसी बात पर बहस कर रहे है तो  उनके  अनशन के औचित्य पर और उसके सही या गलत होने पर. राहुल गांधी (तथा कथित युवावों के नेता, भारत के भविष्य? कांग्रेसी  चाटुकारों के जबान में) ने तो अन्ना के अनशन को लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा करार दे दिया. शायद राहुल गाँधी की समझ लोकतंत्र के बारे में यही है? क्या लोकतंत्र जनांदोलनो से खतरे में पद सकता है? लोक तंत्र किसका है और किसके लिए है? क्या चंद चुने हुए लोग समूची जनता के  भाग्यविधाता हो सकते है? अपनी बात कलो शांति पूर्ण तरीके से व्यक्त करने को क्या राष्ट्र विरोधी और लोक तंत्र विरोधी कहेंगे? शायद राहुल की सोंच यही हो. हो भी क्यों न जिसने गरीबी के दर्शन न किये हो, इतना बड़ा राष्ट्र विरासत(?) में मिल गया हो, अरबों रूपये के ट्रस्ट हो, उसकी सोंच क्या होगी?. राहुल को अपनी सर्कार की डकैती नहीं दिखती, उसपर उनके कोई विचार नहीं है, किसी घोटाले से उनका मन आहत नहीं होता, किसानो के आत्महत्या करने, महगाई के बेतहासा बदने, और गरीबों के निरंतर गरीब होने पर उनके पास कोई विचार नहीं है, मनमोहन जैसे निकम्मे व्यक्ति की वोट में चल रही इस साझा लूट पर अगर एक मध्यम वर्गीय व्यक्ति ने आवाज उठाई तो कागरेसी   सरदार का खून खुल उठा. कांग्रेसी निकम्मों को जब तक हम चुनते रहेगें हमारी और राष्ट्र दोनों की दुर्गती होती रहेगी. क्योंकी भ्रष्टआचार में सबसे बड़ा हिस्सा इन्ही चोरो का है.

(शब्दों के चयन के लिए छमा करें पर क्रोध को व्यक्त करने के लिए इन्हें लिखना पड़ा)

Sunday, March 27, 2011

सिंहासन खाली करो कि जनता आती है / रामधारी सिंह "दिनकर"

सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

जनता?हां,मिट्टी की अबोध मूरतें वही,
जाडे-पाले की कसक सदा सहनेवाली,
जब अंग-अंग में लगे सांप हो चुस रहे
तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहनेवाली।

जनता?हां,लंबी - बडी जीभ की वही कसम,
"जनता,सचमुच ही, बडी वेदना सहती है।"
"सो ठीक,मगर,आखिर,इस पर जनमत क्या है?"
'है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है?"

मानो,जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं,
जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में;
अथवा कोई दूधमुंही जिसे बहलाने के
जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में।

लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढाती है;
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,
सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,
जनता की रोके राह,समय में ताव कहां?
वह जिधर चाहती,काल उधर ही मुड़ता है।

अब्दों, शताब्दियों, सहस्त्राब्द का अंधकार
बीता;गवाक्ष अंबर के दहके जाते हैं;
यह और नहीं कोई,जनता के स्वप्न अजय
चीरते तिमिर का वक्ष उमड़ते जाते हैं।

सब से विराट जनतंत्र जगत का आ पहुंचा,
तैंतीस कोटि-हित सिंहासन तय करो
अभिषेक आज राजा का नहीं,प्रजा का है,
तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो।

आरती लिये तू किसे ढूंढता है मूरख,
मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में?
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे,
देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में।

फावड़े और हल राजदण्ड बनने को हैं,
धूसरता सोने से श्रृंगार सजाती है;
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। 

आशा का दीपक / रामधारी सिंह "दिनकर"


वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नही है
थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नही है

चिन्गारी बन गयी लहू की बून्द गिरी जो पग से
चमक रहे पीछे मुड देखो चरण-चिनह जगमग से
बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नही है
थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नही है
अपनी हड्डी की मशाल से हृदय चीरते तम का,
सारी रात चले तुम दुख झेलते कुलिश का।
एक खेय है शेष, किसी विध पार उसे कर जाओ;
वह देखो, उस पार चमकता है मन्दिर प्रियतम का।
आकर इतना पास फिरे, वह सच्चा शूर नहीं है;
थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।
दिशा दीप्त हो उठी प्राप्त कर पुण्य-प्रकाश तुम्हारा,
लिखा जा चुका अनल-अक्षरों में इतिहास तुम्हारा।
जिस मिट्टी ने लहू पिया, वह फूल खिलाएगी ही,
अम्बर पर घन बन छाएगा ही उच्छ्वास तुम्हारा।
और अधिक ले जाँच, देवता इतन क्रूर नहीं है।
थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।

आग की भीख / रामधारी सिंह "दिनकर"

धुँधली हुईं दिशाएँ, छाने लगा कुहासा, 
कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँ-सा।
कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है;
मुँह को छिपा तिमिर में क्यों तेज रो रहा है?
दाता, पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे,
बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे।
प्यारे स्वदेश के हित अंगार माँगता हूँ।
चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ।

बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है,
कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है?
मँझधार है, भँवर है या पास है किनारा?
यह नाश आ रहा या सौभाग्य का सितारा?
आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा,
भगवान, इस तरी को भरमा न दे अँधेरा।
तम-बेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ।
ध्रुव की कठिन घड़ी में पहचान माँगता हूँ।

आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है,
बल-पुँज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है,
अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ ढेर हो रहा है,
है रो रही जवानी, अन्धेर हो रहा है।
निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है।
निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है।
पंचास्य-नाद भीषण, विकराल माँगता हूँ।
जड़ता-विनाश को फिर भूचाल माँगता हूँ।

मन की बँधी उमंगें असहाय जल रही हैं,
अरमान-आरज़ू की लाशें निकल रही हैं।
भीगी-खुली पलों में रातें गुज़ारते हैं,
सोती वसुन्धरा जब तुझको पुकारते हैं।
इनके लिये कहीं से निर्भीक तेज ला दे,
पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे।
उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ।
विस्फोट माँगता हूँ, तूफान माँगता हूँ।

आँसू-भरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे,
मेरे श्मशान में आ श्रृंगी जरा बजा दे;
फिर एक तीर सीनों के आर-पार कर दे,
हिमशीत प्राण में फिर अंगार स्वच्छ भर दे।
आमर्ष को जगाने वाली शिखा नई दे,
अनुभूतियाँ हृदय में दाता, अनलमयी दे।
विष का सदा लहू में संचार माँगता हूँ।
बेचैन ज़िन्दगी का मैं प्यार माँगता हूँ।

ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे,
जो राह हो हमारी उसपर दिया जला दे।
गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे।
इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे।
हम दे चुके लहू हैं, तू देवता विभा दे,
अपने अनल-विशिख से आकाश जगमगा दे।
प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ,
तेरी दया विपद् में भगवान, माँगता हूँ

Saturday, March 12, 2011

जापान में आई विपदा में ईश्वर सभी जापानी बंधुओं की मदद करें.!!

Monday, March 7, 2011

ज़िंदगी बदल रही है !!


जब मैं छोटा था
शायद ज़िंदगी बदल रही है!!
जब मैं छोटा था, शायद दुनिया
बहुत बड़ी हुआ करती थी..
मुझे याद है मेरे घर से “स्कूल” तक
का वो रास्ता, क्या क्या नहीं था वहां,
चाट के ठेले, जलेबी की दुकान,
बर्फ के गोले, सब कुछ,
अब वहां “मोबाइल शॉप”,
“विडियो पार्लर” हैं,
फिर भी सब सूना है..
शायद अब दुनिया सिमट रही है…
जब मैं छोटा था,
शायद शामें बहुत लम्बी हुआ करती थीं…
मैं हाथ में पतंग की डोर पकड़े,
घंटों उड़ा करता था,
वो लम्बी “साइकिल रेस”,
वो बचपन के खेल,
वो हर शाम थक के चूर हो जाना,
अब शाम नहीं होती, दिन ढलता है
और सीधे रात हो जाती है.
शायद वक्त सिमट रहा है..
जब मैं छोटा था,
शायद दोस्ती
बहुत गहरी हुआ करती थी,
दिन भर वो हुजूम बनाकर खेलना,
वो दोस्तों के घर का खाना,
वो लड़कियों की बातें,
वो साथ रोना…
अब भी मेरे कई दोस्त हैं,
पर दोस्ती जाने कहाँ है,
जब भी “traffic signal” पे मिलते हैं
“Hi” हो जाती है,
और अपने अपने रास्ते चल देते हैं,
होली, दीवाली, जन्मदिन,
नए साल पर बस SMS आ जाते हैं,
शायद अब रिश्ते बदल रहें हैं..
जब मैं छोटा था,
तब खेल भी अजीब हुआ करते थे,
छुपन छुपाई, लंगडी टांग,
पोषम पा, कट केक,
टिप्पी टीपी टाप.
अब internet, office,
से फुर्सत ही नहीं मिलती..
शायद ज़िन्दगी बदल रही है.
जिंदगी का सबसे बड़ा सच यही है..
जो अक्सर कबरिस्तान के बाहर
बोर्ड पर लिखा होता है…
“मंजिल तो यही थी,
बस जिंदगी गुज़र गयी मेरी
यहाँ आते आते”
.
ज़िंदगी का लम्हा बहुत छोटा सा है…
कल की कोई बुनियाद नहीं है
और आने वाला कल सिर्फ सपने में ही है..
अब बच गए इस पल में..
तमन्नाओं से भरी इस जिंदगी में
हम सिर्फ भाग रहे हैं..
कुछ रफ़्तार धीमी करो,
मेरे दोस्त,
और इस ज़िंदगी को जियो…
खूब जियो मेरे दोस्त,
और औरों को भी जीने दो..

---- Unknown

Saturday, March 5, 2011

मधुशाला - madhushala

॥हरिवंश राय बच्चन कृत मधुशाला॥

मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला
प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला
पहले भोग लगा लूँ तेरा, फ़िर प्रसाद जग पाएगा
सबसे पहले तेरा स्वागत, करती मेरी मधुशाला॥१॥

प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूणर् निकालूँगा हाला
एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला
जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका
आज निछावर कर दूँगा मैं, तुझपर जग की मधुशाला॥२॥

भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला
कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला
कभी न कण- भर ख़ाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ!
पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला॥३॥

मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला
' किस पथ से जाऊँ? ' असमंजस में है वह भोलाभाला
अलग- अलग पथ बतलाते सब, पर मैं यह बतलाता हूँ -
' राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला॥४॥

चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला!
' दूर अभी है ' , पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला
हिम्मत है न बढ़ूँ आगे, साहस है न फ़िरूँ पीछे
किंकतर्व्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला॥५॥

मुख से तू अविरत कहता जा मधु, मदिरा, मादक हाला
हाथों में अनुभव करता जा एक ललित कल्पित प्याला
ध्यान किए जा मन में सुमधुर सुखकर, सुंदर साकी का
और बढ़ा चल, पथिक, न तुझको दूर लगेगी मधुशाला॥६॥

मदिरा पीने की अभिलाषा ही बन जाए जब हाला
अधरों की आतुरता में ही जब आभासित हो प्याला
बने ध्यान ही करते- करते जब साकी साकार, सखे
रहे न हाला, प्याला साकी, तुझे मिलेगी मधुशाला॥७॥

हाथों में आने से पहले नाज़ दिखाएगा प्याला
अधरों पर आने से पहले अदा दिखाएगी हाला
बहुतेरे इनकार करेगा साकी आने से पहले
पथिक, न घबरा जाना, पहले मान करेगी मधुशाला॥८॥

लाल सुरा की धार लपट सी कह न इसे देना ज्वाला
फ़ेनिल मदिरा है, मत इसको कह देना उर का छाला
ददर् नशा है इस मदिरा का विगतस्मृतियाँ साकी हैं
पीड़ा में आनंद जिसे हो, आये मेरी मधुशाला॥९॥

लालायित अधरों से जिसने, हाय, नहीं चूमी हाला
हषर्- विकंपित कर से जिसने हा, न छुआ मधु का प्याला
हाथ पकड़ लज्जित साकी का पास नहीं जिसने खींचा
व्यर्थ सुखा डाली जीवन की उसने मधुमय मधुशाला॥१०॥

नहीं जानता कौन, मनुज आया बनकर पीनेवाला
कौन अपरिचित उस साकी से जिसने दूध पिला पाला
जीवन पाकर मानव पीकर मस्त रहे, इस कारण ही
जग में आकर सवसे पहले पाई उसने मधुशाला॥११॥

सूयर् बने मधु का विक्रेता, सिंधु बने घट, जल, हाला
बादल बन- बन आए साकी, भूमि बने मधु का प्याला
झड़ी लगाकर बरसे मदिरा रिमझिम, रिमझिम, रिमझिम कर
बेलि, विटप, तृण बन मैं पीऊँ, वर्षा ऋतु हो मधुशाला॥१२॥

अधरों पर हो कोई भी रस जिह्वा पर लगती हाला
भाजन हो कोई हाथों में लगता रक्खा है प्याला
हर सूरत साकी की सूरत में परिवतिर्त हो जाती
आँखों के आगे हो कुछ भी, आँखों में है मधुशाला॥१३॥

साकी बन आती है प्रातः जब अरुणा ऊषा बाला
तारक- मणि- मंडित चादर दे मोल धरा लेती हाला
अगणित कर- किरणों से जिसको पी, खग पागल हो गाते
प्रति प्रभात में पूणर् प्रकृति में मुखरित होती मधुशाला॥१४॥

साकी बन मुरली आई साथ लिए कर में प्याला
जिनमें वह छलकाती लाई अधर- सुधा- रस की हाला
योगिराज कर संगत उसकी नटवर नागर कहलाए
देखो कैसें- कैसों को है नाच नचाती मधुशाला॥१५॥

वादक बन मधु का विक्रेता लाया सुर- सुमधुर- हाला
रागिनियाँ बन साकी आई भरकर तारों का प्याला
विक्रेता के संकेतों पर दौड़ लयों, आलापों में
पान कराती श्रोतागण को, झंकृत वीणा मधुशाला॥१६॥

चित्रकार बन साकी आता लेकर तूली का प्याला
जिसमें भरकर पान कराता वह बहु रस- रंगी हाला
मन के चित्र जिसे पी- पीकर रंग- बिरंग हो जाते
चित्रपटी पर नाच रही है एक मनोहर मधुशाला॥१७॥

हिम श्रेणी अंगूर लता- सी फ़ैली, हिम जल है हाला
चंचल नदियाँ साकी बनकर, भरकर लहरों का प्याला
कोमल कूर- करों में अपने छलकाती निशिदिन चलतीं
पीकर खेत खड़े लहराते, भारत पावन मधुशाला॥१८॥

आज मिला अवसर, तब फ़िर क्यों मैं न छकूँ जी- भर हाला
आज मिला मौका, तब फ़िर क्यों ढाल न लूँ जी- भर प्याला
छेड़छाड़ अपने साकी से आज न क्यों जी- भर कर लूँ
एक बार ही तो मिलनी है जीवन की यह मधुशाला॥१९॥

दो दिन ही मधु मुझे पिलाकर ऊब उठी साकीबाला
भरकर अब खिसका देती है वह मेरे आगे प्याला
नाज़, अदा, अंदाजों से अब, हाय पिलाना दूर हुआ
अब तो कर देती है केवल फ़ज़र् - अदाई मधुशाला॥२०॥

छोटे- से जीवन में कितना प्यार करूँ, पी लूँ हाला
आने के ही साथ जगत में कहलाया ' जानेवाला'
स्वागत के ही साथ विदा की होती देखी तैयारी
बंद लगी होने खुलते ही मेरी जीवन- मधुशाला॥२१॥

क्या पीना, निद्वर्न्द्व न जब तक ढाला प्यालों पर प्याला
क्या जीना, निरिंचत न जब तक साथ रहे साकीबाला
खोने का भय, हाय, लगा है पाने के सुख के पीछे
मिलने का आनंद न देती मिलकर के भी मधुशाला॥२२॥

मुझे पिलाने को लाए हो इतनी थोड़ी- सी हाला!
मुझे दिखाने को लाए हो एक यही छिछला प्याला!
इतनी पी जीने से अच्छा सागर की ले प्यास मरूँ
सिंधु- तृषा दी किसने रचकर बिंदु- बराबर मधुशाला॥२३॥

क्षीण, क्षुद्र, क्षणभंगुर, दुबर्ल मानव मिट्टी का प्याला
भरी हुई है जिसके अंदर कटु- मधु जीवन की हाला
मृत्यु बनी है निदर्य साकी अपने शत- शत कर फ़ैला
काल प्रबल है पीनेवाला, संसृति है यह मधुशाला॥२४॥

यम आयेगा साकी बनकर साथ लिए काली हाला
पी न होश में फ़िर आएगा सुरा- विसुध यह मतवाला
यह अंतिम बेहोशी, अंतिम साकी, अंतिम प्याला है
पथिक, प्यार से पीना इसको फ़िर न मिलेगी मधुशाला॥२५॥

शांत सकी हो अब तक, साकी, पीकर किस उर की ज्वाला
' और, और' की रटन लगाता जाता हर पीनेवाला
कितनी इच्छाएँ हर जानेवाला छोड़ यहाँ जाता!
कितने अरमानों की बनकर कब्र खड़ी है मधुशाला॥२६॥

जो हाला मैं चाह रहा था, वह न मिली मुझको हाला
जो प्याला मैं माँग रहा था, वह न मिला मुझको प्याला
जिस साकी के पीछे मैं था दीवाना, न मिला साकी
जिसके पीछे था मैं पागल, हा न मिली वह मधुशाला!॥२७॥

देख रहा हूँ अपने आगे कब से माणिक- सी हाला
देख रहा हूँ अपने आगे कब से कंचन का प्याला
' बस अब पाया! ' - कह- कह कब से दौड़ रहा इसके पीछे
किंतु रही है दूर क्षितिज- सी मुझसे मेरी मधुशाला॥२८॥

हाथों में आने- आने में, हाय, फ़िसल जाता प्याला
अधरों पर आने- आने में हाय, ढलक जाती हाला
दुनियावालो, आकर मेरी किस्मत की ख़ूबी देखो
रह- रह जाती है बस मुझको मिलते- मिलते मधुशाला॥२९॥

प्राप्य नही है तो, हो जाती लुप्त नहीं फ़िर क्यों हाला
प्राप्य नही है तो, हो जाता लुप्त नहीं फ़िर क्यों प्याला
दूर न इतनी हिम्मत हारूँ, पास न इतनी पा जाऊँ
व्यर्थ मुझे दौड़ाती मरु में मृगजल बनकर मधुशाला॥३०॥

मदिरालय में कब से बैठा, पी न सका अब तक हाला
यत्न सहित भरता हूँ, कोई किंतु उलट देता प्याला
मानव- बल के आगे निबर्ल भाग्य, सुना विद्यालय में
' भाग्य प्रबल, मानव निर्बल' का पाठ पढ़ाती मधुशाला॥३१॥

उस प्याले से प्यार मुझे जो दूर हथेली से प्याला
उस हाला से चाव मुझे जो दूर अधर से है हाला
प्यार नहीं पा जाने में है, पाने के अरमानों में!
पा जाता तब, हाय, न इतनी प्यारी लगती मधुशाला॥३२॥

मद, मदिरा, मधु, हाला सुन- सुन कर ही जब हूँ मतवाला
क्या गति होगी अधरों के जब नीचे आएगा प्याला
साकी, मेरे पास न आना मैं पागल हो जाऊँगा
प्यासा ही मैं मस्त, मुबारक हो तुमको ही मधुशाला॥३३॥

क्या मुझको आवश्यकता है साकी से माँगूँ हाला
क्या मुझको आवश्यकता है साकी से चाहूँ प्याला
पीकर मदिरा मस्त हुआ तो प्यार किया क्या मदिरा से!
मैं तो पागल हो उठता हूँ सुन लेता यदि मधुशाला॥३४॥

एक समय संतुष्ट बहुत था पा मैं थोड़ी- सी हाला
भोला- सा था मेरा साकी, छोटा- सा मेरा प्याला
छोटे- से इस जग की मेरे स्वगर् बलाएँ लेता था
विस्तृत जग में, हाय, गई खो मेरी नन्ही मधुशाला!॥३५॥

मैं मदिरालय के अंदर हूँ, मेरे हाथों में प्याला
प्याले में मदिरालय बिंबित करनेवाली है हाला
इस उधेड़- बुन में ही मेरा सारा जीवन बीत गया -
मैं मधुशाला के अंदर या मेरे अंदर मधुशाला!॥३६॥

किसे नहीं पीने से नाता, किसे नहीं भाता प्याला
इस जगती के मदिरालय में तरह- तरह की है हाला
अपनी- अपनी इच्छा के अनुसार सभी पी मदमाते
एक सभी का मादक साकी, एक सभी की मधुशाला॥३७॥

वह हाला, कर शांत सके जो मेरे अंतर की ज्वाला
जिसमें मैं बिंबित- प्रतिबिंबित प्रतिपल, वह मेरा प्याला
मधुशाला वह नहीं जहाँ पर मदिरा बेची जाती है
भेंट जहाँ मस्ती की मिलती मेरी तो वह मधुशाला॥३८॥

मतवालापन हाला से ले मैंने तज दी है हाला
पागलपन लेकर प्याले से, मैंने त्याग दिया प्याला
साकी से मिल, साकी में मिल अपनापन मैं भूल गया
मिल मधुशाला की मधुता में भूल गया मैं मधुशाला॥३९॥

कहाँ गया वह स्वगिर्क साकी, कहाँ गयी सुरभित हाला
कहाँ गया स्वपनिल मदिरालय, कहाँ गया स्वणिर्म प्याला!
पीनेवालों ने मदिरा का मूल्य, हाय, कब पहचाना?
फ़ूट चुका जब मधु का प्याला, टूट चुकी जब मधुशाला॥४०॥

अपने युग में सबको अनुपम ज्ञात हुई अपनी हाला
अपने युग में सबको अद्भुत ज्ञात हुआ अपना प्याला
फ़िर भी वृद्धों से जब पूछा एक यही उत्तर पाया -
अब न रहे वे पीनेवाले, अब न रही वह मधुशाला!॥४१॥

कितने ममर् जता जानी है बार- बार आकर हाला
कितने भेद बता जाता है बार- बार आकर प्याला
कितने अथोर् को संकेतों से बतला जाता साकी
फ़िर भी पीनेवालों को है एक पहेली मधुशाला॥४२॥

जितनी दिल की गहराई हो उतना गहरा है प्याला
जितनी मन की मादकता हो उतनी मादक है हाला
जितनी उर की भावुकता हो उतना सुन्दर साकी है
जितना ही जो रसिक, उसे है उतनी रसमय मधुशाला॥४३॥

मेरी हाला में सबने पाई अपनी- अपनी हाला
मेरे प्याले में सबने पाया अपना- अपना प्याला
मेरे साकी में सबने अपना प्यारा साकी देखा
जिसकी जैसी रूचि थी उसने वैसी देखी मधुशाला॥४४॥

यह मदिरालय के आँसू हैं, नहीं- नहीं मादक हाला
यह मदिरालय की आँखें हैं, नहीं- नहीं मधु का प्याला
किसी समय की सुखदस्मृति है साकी बनकर नाच रही
नहीं- नहीं कवि का हृदयांगण, यह विरहाकुल मधुशाला॥४५॥

कुचल हसरतें कितनी अपनी, हाय, बना पाया हाला
कितने अरमानों को करके ख़ाक बना पाया प्याला!
पी पीनेवाले चल देंगे, हाय, न कोई जानेगा
कितने मन के महल ढहे तब खड़ी हुई यह मधुशाला!॥४६॥

विश्व तुम्हारे विषमय जीवन में ला पाएगी हाला
यदि थोड़ी- सी भी यह मेरी मदमाती साकीबाला
शून्य तुम्हारी घड़ियाँ कुछ भी यदि यह गुंजित कर पाई
जन्म सफ़ल समझेगी जग में अपना मेरी मधुशाला॥४७॥

बड़े- बड़े नाज़ों से मैंने पाली है साकीबाला
कलित कल्पना का ही इसने सदा उठाया है प्याला
मान- दुलारों से ही रखना इस मेरी सुकुमारी को
विश्व, तुम्हारे हाथों में अब सौंप रहा हूँ मधुशाला॥४८॥

नीड़ का निर्माण फिर फिर - Need ka nirman fir fir


यह कविता मुझे हमेशा उर्जा देती हाय :

नीड़ का निर्माण फिर फिर, नेह का आह्वान फिर फिर

यह उठी आंधी की नभ में छा गया सहसा अँधेरा
धुलिधुसर बादलों ने धरती को इस भाँती घेरा
रात सा दिन हो गया फिर रात आई और काली
लग रहा था अब न होगा इस निशा का फिर सवेरा
रात के उत्पात-भय से भीत जन जन भीत कण कण
किन्तु प्राची से उषा की मोहिनी मुस्कान फिर फिर
नीड़ का निर्माण फिर फिर .....

क्रुद्ध नभ के वज्रदंतो में उषा है मुस्कुराती
घोर-गर्जनमय गगन ने कंठ में खग-पंक्ति गाती
एक चिडिया चोंच में तिनका लिए जो जा रही हैं
वह सहज में ही पवन उनचास को नीचा दिखाती
नाश के भय से कभी दबता नहीं निर्माण का सुख
प्रलय की निस्तब्धता में सृष्टि का नवगान फिर फिर
नीड़ का निर्माण फिर फिर....

- हरिवंशराय बच्चन

Sunday, February 27, 2011

बाबा राम देव - सही या गलत ??

बाबा राम देव के भ्रष्टाचार विरोध और काले धन के वापसी के आन्दोलन पर बहुत लोगों की राय है की एक सन्यासी को राजनीतिक पैंतरों से दूर रहना चाहिए. शायद दूसरी दुनिया में रहने वाले ये लोग भारतीय सन्यासी परंपरा के बारे में नितांत अपरिचित है. और शायद ये सन्यासियों को गुफा कन्दरा में रहने वाला जीव समझते है?. एसे सब लोगो से मेरा एक ही विनम्र अनुरोध है के समग्रता से स्वामी विवेकानंद को पड़े. तब उनको समझ में ए गा की सन्यास परंपरा का उदय ही इन्ही कार्यों के लिए हुआ था. एक सन्यासी जो अपने पराये के प्रपंचो दूर है. उससे अधिक लोक मंगल कौन शोंच सकलता है? और महाकवि तुलसीदास को मने तो "संत वही जो लोक मंगल के लिए व्यग्र हो' क्या स्वामी रामदेव जी की यह व्यग्रता लोक मंगल के लिए नहीं है?? क्या कला धन वापस आया तो सिर्फ उन्हें व्यक्तिगत लाभ होगा? क्या भ्रष्टाचारियों से उनकी निजी दुश्मनी है??

भगवन स्वामी राम देव को उनके मार्ग में अनंत शक्तियों से उनको आप्लावित करें. और हम सब लोगो को सदबुधि दें. 

महेश. 

Saturday, February 26, 2011

क्या कांग्रेस भ्रष्टआचार खत्म करने के लिए संकल्पित है???

शायद यह सबसे बड़ा प्रश्न है जिसका उत्तर देना कोई कंग्रेस्सी नहीं चाहता. भारतीय इतिहास के सबसे कमजोर और निकम्मे प्रधान मंत्री के रूप में मनमोहन सिंह जे भारत और उसकी जनता के लिए कांग्रेस द्वारा थोपी गयी विडम्बना रहे है. अगर मनमोहन सर्कार भ्रस्ताचार के मुद्दे और काले धन के मुद्दे पर इतनी ही संकल्प बद्ध है तो योग ऋषी बाबा राम देव जी का विरोध क्यों??उन्होंने तो अपने किसी भी आयोजन में भ. ज. प्. का नाम तक नहीं लिया है. उनका एक मात्र विरोध बड़ते भ्रष्टाचार और काले धन की वापसी को लेकर है. पर इस पर कांग्रेस को मिर्च क्यों कर लग रही है?? शायद इसी लिए क्योंकि वे सारे कालाबाजारी या तो कंग्रेस्सी है या फिर कांग्रेस की च्च्त्रछाया में है. मनमोहन जी  को  अगर प्रधानमंत्री जैसा महत्वपूर्ण पद मिला तो यह देश का सौभाग्य नहीं बल्कि उनका सौभाग्य था की देश ने उनको चुना. किन्तु यह घोर विडम्बना थी जिसकी मार हम लम्बे अरसे तक झेलें गे. 

बहुत निस्तेज और कबूतरी चेहरे वाले मनमोहन सिंह जी को देख कर मन में घोर अवसाद पैदा होता है... आखिर सरवोछ पद पर आसीन यह व्यक्ति देश को किस दिशा में ले जा रहा है?? इतिहास आखिर मनमोहन सिंह को किस रूप में यद् रखना चाहेगा??